कच्ची सड़क

आज काफी समय बाद मैंने अपने ब्लॉग में लॉगिन किया। प्रथम पृष्ठ पर ही मुझे कई अपूर्ण प्रारूप मिले। शब्द पीपल के पत्तो की तरह बिखरे पड़े थे। एक हवा का झोंका आता और इन सबको अपने साथ उड़ा ले जाता। इन सभी को लिखते समय मैंने इन्हे पूरा करने का संकल्प किया था। परन्तु समय के अभाव और ज़िन्दगी के जटिल स्वभाव में ये संकल्प भी उन पीपल की पत्तो की तरह कहीं उड़ सा गया था। इन्हे पूरा करने की मैं अब चेष्टा भी नहीं करना चाहता। क्यूंकि इन शब्दों के प्राण पखेरू अब उड़ चुके हैं। ना ही अब समय वह बीता हुआ समय है। और ना ही व्यक्ति।

आप आज दार्शनिको की तरह क्यों बात कर रहे हैं? और आज एकाएक हिंदी भाषा का प्रयोग कैसे? मैं काफी समय से यह प्रयोग करने को उत्सुक था। और एक मित्र की सलाह ने अंततः मुझे हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित किया। मैंने ये लिखते समय यह भी अनुभव किया की हिंदी में दर्शन शाश्त्र इस तरह से बसा हुआ है की अंग्रेजी इस छेत्र में उसका प्रतियोगी नहीं हो सकता। यह भी संभव है की हर व्यक्ति अपनी प्रथम भाषा में जिस तरह भावित होता है वैसा किसी और भाषा में होना संभव नहीं।

लखनऊ में जब भी मैं हुसैनाबाद की तरफ से गुजरता था, वहाँ के घंटाघर पर मेरा ध्यान हमेशा ही जाता था। उसके घंटे को मैं पेंडुलम की तरह इधर से उधर नाचते मैं देखता रहता। कई वर्षो बाद आज जीवन भी उसी प्रकार दफ्तर और घर के बीच में नाचता हुआ नज़र आता है। इसमें कोई शोध करने वाली बात नहीं है। मैं इसे इस राह की एक अवस्था मात्रा समझता हूँ। मैं मानता हूँ की जीवन में ये अवस्था सामान्य है और काफी सीमा तक आवश्यक भी है। इसी नज़रिये से चीज़ो को देखते हुवे आगे बढ़ते रहने की मैं सदैव कोशिश करनी चाहिए।

अभी यहीं पर रुकता हूँ। बिन बुलाये मेहमान की तरह एक अनावश्यक कार्य मेरे सर पर सवार हो चुका है और टस से मस होने का नाम नहीं ले रहा। इसकी उचित व्यवस्था करने जाना होगा। समय की मर्ज़ी हुइ तो फिर मिलेंगे।

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